‘कंटेंट क्रिएटर’, भारत में ये टर्म अब हर किसी की ज़ुबां पर है, ख़ासकर जेन ज़ी तो अक्सर आपको फॉलोअर्स, लाइक्स और वायरल कंटेंट की बात करते हुए मिल जाएंगे.

20-25 लाख लोग मोबाइल की छह इंच की स्क्रीन पर शोहरत के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं.

लेकिन सवाल ये है कि कमाई कितने लोगों की हो रही है और क्या है कंटेंट क्रिएटर इकोनॉमी का सच.

आज के पैसा वसूल में बात इसी पर.

बात कोई 15 साल पुरानी है जब भारत में कुछ लोगों ने कंटेंट क्रिएशन को कमाई के रूप में देखना शुरू किया, ये अलग बात है कि तब इन कंटेंट क्रिएटर्स को उनके अड़ोसी-पड़ोसी और नाते-रिश्तेदार बेरोज़गार बताया करते थे. लेकिन आज हालात बदल गए हैं.

इसी साल मई में मुंबई में हुए वेव्स समिट में बताया गया कि भारत के डिजिटल क्रिएटर्स हर साल करीब 350 अरब डॉलर की कस्टमर स्पैंडिंग को इन्फ्लुएंस कर रहे हैं और अगले पाँच साल में ये आंकड़ा एक ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा.

मतलब भारत की कंटेंट क्रिएटर इकोनॉमी एक लाख करोड़ डॉलर हो जाएगी.

भारत सरकार ने भी इसे बहुत सीरियसली लिया है. मार्च 2025 में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि क्रिएटर इकोनॉमी के लिए 100 करोड़ डॉलर का इंतज़ाम किया जाएगा.

अब कुछ समझ में आया?

अपने मोबाइल स्क्रीन पर आप जिन क्रिएटर्स का एक-डेढ़ मिनट का कंटेंट देख रहे होते हैं, वो दरअसल देश की बड़ी सेल्स फोर्स बनते जा रहे हैं.

रिपोर्ट बताती है कि भारत में 20 से 25 लाख एक्टिव डिजिटल क्रिएटर हैं, जिनके 1000 से अधिक फॉलोअर्स हैं और जो रेगुलरली प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट पोस्ट कर रहे हैं. और बताने की ज़रूरत नहीं कि सस्ते डेटा की वजह से जेन ज़ी के बीच इस फॉर्मूले को कैश करने की होड़ दिन पर दिन बढ़ती जा रही है.

पर सवाल ये है कि कितने लोग हैं जिनकी इससे कमाई हो रही है ?

तो जवाब आपको चौंका सकता है. बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ़ 8 से 10 फ़ीसदी क्रिएटर्स ही अपने कंटेंट से पैसा बना पा रहे हैं.

यानी 20 से 25 लाख एक्टिव क्रिएटर्स में से कमाई सिर्फ़ 2 से ढाई लाख को हो रही है. बाकी के 90-92 फ़ीसदी क्रिएटर्स या तो बहुत कम कमाते हैं या फिर सोशल मीडिया से कमाई उनका प्राइमरी सोर्स नहीं है.

आप ये भी जानना चाहेंगे कि कंटेंट क्रिएटर्स को ये कमाई आख़िर होती कैसे है.

तो टॉप क्रिएटर्स बड़े ब्रैंड्स के साथ पार्टनरशिप करते हैं, चूंकि उनके पास बड़ी ऑडियंस होती है इससे वे अपने वीडियो के ज़रिए एक्सक्लूसिव कंटेंट बेचते हैं. इसके अलावा ब्रैंड स्पॉन्सरशिप, प्लेटफॉर्म एड, एफिलिएट मार्केटिंग, सब्सक्रिप्शन और प्रीमियम कंटेंट से भी उन्हें कमाई होती है.

लेकिन असली माला-माल कौन हो रहा है?

ये सही है भारत में कई कंटेंट क्रिएटर्स करोड़पति बने हैं, लेकिन उन्हें करोड़पति बनाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ही इस खेल के असली विनर हैं. बिज़नेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में यूट्यूब के भारतीय ऑपरेशन की आय 14,300 करोड़ रुपये रही, वहीं फ़ेसबुक यानी मेटा का टर्नओवर भी हज़ारों करोड़ रुपये का रहा.

कंटेंट क्रिएशन में कंपटीशन है. कंपटीशन है तो प्रेशर भी है.

इसमें कंपेरिजन और अनसक्सेसफुल होने का साइकोलॉजिकल प्रेशर भी बहुत ज़्यादा होता है.

इसमें कोई शक नहीं कि कंटेंट क्रिएशन एक बड़ा मार्केट है, लेकिन सक्सेस मिलना भी उतना ही मुश्किल.

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